आपको पता तो होगा ही कि भारत में बहस के मामले में क्रिकेट और फिल्में हमेशा दूसरी और तीसरी पायदान पर रहती हैं, पहले पर हमेशा पॉलिटिक्स काबिज मिलेगी. पॉलिटिक्स का नाम लेते ही ले पप्पू ले फेंकू ले भक्त ले खांग्रेसी ले आपिया जैसी शब्दावली सुनने को मिलती है. 2014 के बाद मोदीभक्त नाम का शब्द प्रचलन में आया. कट्टर मोदी समर्थकों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इनमें वो लोग आते हैं जो चाहे चड्डी बनियान भी उतर जाए, कहेंगे कि मोदी जी ने किया है तो कुछ सोच कर ही किया होगा. लेकिन आज थोड़ी उल्टी गंगा बहाते हैं. एक किस्सा सुनाते हैं जिससे आपको मोदी भक्तों का कद एकदम से छोटा होता दिखेगा.

बात सन 1978 की है. देश के प्रधानमंत्री थे मोरार जी देसाई. गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह के आदेश पर इंदिरा गांधी को अरेस्ट कर लिया गया था. हालांकि उन पर जो चार्ज लगे वो कोर्ट में प्रूफ नहीं हो सके. इंदिरा को अरेस्ट कराने के पीछे मुख्य वजह थी संसद से निकालना. तो गिरफ्तारी के साथ ही संसद से छुट्टी हो गई उनकी. इसी पृष्ठभूमि पर आगे की कहानी है.

20 दिसंबर की शाम. 5 बजकर 45 मिनट पर लखनऊ एयरपोर्ट से एक जहाज उड़ा. इंडियन एयरलाइन्स का जहा बोइंग 737. इसमें 126 पैसेंजर सवार थे. इनमें दो बेहद खास लोग थे. पिछली इंदिरा सरकार में इमरजेंसी के दौरान मंत्री रहे एके सेन और धरम वीर सिन्हा. दिल्ली के लिए प्लेन ने उड़ान भरी.

सब कुछ बिल्कुल सही जा रहा था. दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर लैंड करने से 15 मिनट पहले खेल शुरू हो गया. सीटों की पंद्रहवीं लाइन से दो नौजवान निकले. और कॉकपिट की तरफ बढ़ चले. इनके नाम पैसेंजर लिस्ट में दर्ज थे, भोलानाथ पांडे और देवेंद्र पांडे के नाम से. भोला की उमर 27 और देवेंद्र की 28. दोनों दोस्त थे, रिश्तेदार नहीं. आगे बढ़कर फ्लाइट खजांची जीवी डे से आहिस्ते से बोले “हम कॉकपिट में जाना चाहते हैं. आप इंतजाम कर देंगे?” डे ने कहा कि रुको एक मिनट. आपकी रिक्वेस्ट हम कैप्टन एम एन बट्टीवाला तक पहुंचा देते हैं.

डे साहब आगे बढ़े, कॉकपिट की तरफ. इतने में वहां एयर होस्टेस इंदिरा ठकुरी आ गई. तो एक पांडे जी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे कर दिया. उधर डे ने दरवाजा खोला और उनको धक्का देकर दोनों आदमी अंदर. दरवाजा ऑटोमेटिक होता ही है, बंद हो गया.

अब तक यात्रियों और कैबिन क्रू को यही पता था कि कुछ हुआ है. लेकिन सीरियस बात नहीं है. अंदर से कुछ ही मिनट में पहला एनाउंसमेंट शुरू हुआ. पैसेंजर चौकन्ने हो गए कि क्या हुआ. आवाज आई “हम हाईजैक हो गए हैं. पटना जा रहे हैं.” सबको सांप सूंघ गया. हलचल शुरू होने से पहले दूसरा एनाउंसमेंट आया. कहा गया कि हम बनारस में लैंड करने वाले हैं.

प्लेन हाईजैक करने वालों को प्लेन का P नहीं पता था

अंदर कैबिन में 6 फिट के जवान हट्टे कट्टे कैप्टन बट्टीवाला की हालत खराब. मतलब घबराहट की बात नहीं. उनको प्लेन उड़ाने और लैंड करने की ABCD समझाने में पसीने छूट रहे थे. धेले भर का दिमाग नहीं था उनके पास. हाईजैक करने वाले खुद नर्वसाए हुए थे. शुरू से आखिरी तक कैप्टन का दिमाग चाट गए. दोनों इनकी कनपटी पर पिस्टल टिकाए थे और ये उनको ये समझाने में खर्च हुए जा रहे थे कि एयरक्राफ्ट ऐसे नहीं उड़ता. पहले तो उन्होंने डिमांड की कि इसको उड़ाकर नेपाल ले चलो. उनको बताया कि भैया इत्ता तेल नहीं है इसमें कि काठमांडू पहुंच जाएं. तो कहने लगे कि “फिर बांग्लादेश चलो.” ऐसा लगता था स्कूल में भूगोल नहीं पढ़े थे और चल दिए थे प्लेन हाईजैक करने.

बाहर बैठे लोग पहले कुछ अकुलाए. परेशान हुए. फिर शांत हो गए. जैसे ही दोनों लोग उनके सामने आए, उनमें से कुछ हंसी के मूड में आ गए. कहा कि बनारस नहीं दादा, काठमांडू ले चलो. लेकिन पांडे लोग जोक के मूड में नहीं थे. उनके पास बरबाद करने के लिए टाइम ही कहां था. पैसेंजर्स के सामने खड़े हुए. और वीर रस से सनी स्पीच शुरू कर दी. कहा कि  “हम यूथ इंदिरा कांग्रेस के मेंबर हैं. इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करके जनता पार्टी ने बदला लेने की कोशिश की है. हम गांधीवादी हैं. अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले. हम पैसेंजर्स को बिल्कुल नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. बस हमारी मांगें पूरी होनी चाहिए. इंदिरा गांधी को रिहा करो. इंदिरा गांधी जिंदाबाद. जिंदाबाद जिंदाबाद.”

प्लेन हाईजैक को लेकर सीरियस नहीं थे लोग

तो इंदिरा और संजय गांधी जिंदाबाद पर नारेबाजी थमी. कुछ पैसेंजर्स ने चुपके से तालियां भी बजाईं. जाहिर है पैसेंजर्स के साथ किसी तरह की मार पीट नहीं हुई थी. उनमें से ज्यादातर इस कांड को बिल्कुल सीरियसली नहीं ले रहे थे. सीरियस मामला ये था कि किसी को टॉयलेट यूज नहीं करने दिया जा रहा था. सूसू लगी हो तो भरे बैठे रहो. किसी को अपनी जगह से उठना नहीं है. एके सेन जो थे, पूर्व कांग्रेस सरकार के लॉ मिनिस्टर, इतना गुस्सा हो गए कि चिल्लाने लगे. कहा मैं तो जा रहा हूं, तुम्हारी मर्जी हो तो गोली मार दो.

होते करते ये हुआ कि बनारस आ गया. प्लेन लैंड कर लिया. रनवे पर जाकर खड़ा हुआ. तो दोनों पांडे ने पहली डिमांड रखी कि हमको यूपी के सीएम राम नरेश यादव से बात कराओ. सीएम टालमटोल कर रहे थे. तब पीएम मोरार जी देसाई ने टिंचर दिया. समझाया कि हालात को समझो जूनियर. तब सीएम साहब अपना प्लेन लिए और उड़े वाराणसी के लिए. इतने भर में हाईजैकर्स ने बनारस के जिला अफसरों को अपनी चार डिमांड समझा दी थीं. मेन यही थी कि इंदिरा को रिहा करो, बिना शर्त.

तब के सीएम राम नरेश यादव

तो सीएम साहब से सौदेबाजी शुरू हुई. अरे निगोसिएसन. दुन्नो पांडे ने कहा कि बात करने के लिए प्लेन में आओ. सीएम ने कहा कि कम से कम विदेशी मेहमानों और बच्चों, महिलाओं को जाने दो. तो ये कहने लगे कि पहले आओ तो. जब सीएम राम नरेश यादव आए तो एसके मोदी नाम के पैसेंजर ने पीछे वाला दरवाजा खोल दिया. और खुद भी चुप्पे से कूद कर निकल गया. इधर प्लेन में बतकही सारी रात चलती रही. सीएम पीएम से सलाह करके बतियाते रहे. सख्त निर्देश ये था कि इनकी एक भी डिमांड माननी नहीं है.

तब के पीएम मोरार जी देसाई

पापा ने गुब्बारा फोड़ दिया

बातचीत चल रही थी. सुबह के 6 बज गए. लेकिन अंधेरा था. इधर सर्दियों में इतनी जल्दी सूरज नहीं उगता. प्लेन के अंदर माहौल बहुत खराब था. लोग एकदम उकता गए थे. भयंकर बोर हो गए थे. अरे नौटंकी घंटे दो घंटे अच्छी लगती है. पूरी रात थोड़ी. तो सुबह हुई. हाईजैकर्स ने कहा कि पीछे वाला दरवाजा खोल दो. कैप्टन ने लीवर खींचा. पीछे जो हाइड्रोलिक वाली ट्राली जैसा दरवाजा होता है, वो खुल गया. आधे लोग उतर गए.

इतने में गड़बड़ हो गई. इनमें से एक जने के पापा एयरपोर्ट पर आ गए. और वायरलेस से अपने पूत से संपर्क साधा. जइसे ही उनकी आवाज सुनी, पुतऊ अकबका गए. सुंदर सपना बीत गया. सारी हीरोपंती हवा हो गई. दोनों लोग इंदिरा गांधी जिंदाबाद करते हुए नीचे उतर आए. नीचे इंतजार कर रहे अफसरों के आगे सरेंडर कर दिया. इस तरह ये हाईजैकिंग का खेला खतम हुआ. बाद में पता चला जो कट्टा ये कैप्टन के अड़ाए थे, वो भी नकली थे. बच्चों के खेलने वाले.

आज कहां हैं दोनों इंदिरा भक्त

दो साल बाद सन 80 में पार्टी की तरफ से उनके किए का ईनाम मिला. टिकट की शक्ल में. दोनों विधायक बन गए. यूपी की विधानसभा में धमक हो गई. भोला दो बार विधायक रहे. एक बार सन 80 से 85 तक और दूसरी बार 89 से 91 तक. बलिया के रहने वाले भोला इंडियन यूथ कांग्रेस के जनरल सेक्रेट्री रहे. हां, लोकसभा की तैयारी में खर्च हुए जा रहे हैं. सन 91, 96, 99, 2004, 2009 और 2014 माने हर पंचवर्षीय ये सलेमपुर से किस्मत आजमाते हैं. कामयाबी नहीं मिलती. देवेंद्र पांडे कांग्रेस की वापसी के बाद निष्ठावान कांग्रेसी गिने जाने लगे. राजीव गांधी के करीबी रहे. 24 सितंबर 2017 को उनकी डेथ हो गई थी.