हिंदुओं में मान्यता है, ‘भय माता ने लिख दिए छठी रात के अंक, राई घटे न तिल बढे रह-रह होत निसंग.’ मतलब, भय माता ने बच्चे के पैदा होने के छठवें दिन जो उसके भाग्य में लिख दिया, वो कोई नहीं बदल सकता. मेहता कालू जो ख़ुद एक मुनीम थे अपने बच्चे को भी मुनीम ही बनाना चाहते थे. पर किस्मत में लिखा था कि उस बच्चे को दुनिया का सबसे महान धर्म प्रवर्तक बनना है. और वो बना भी.

लाहौर से कोई 40 मील दूर दक्षिण-पश्चिम में एक गांव है – तलवंडी. इसी गांव में नानक का जन्म एक खत्री परिवार में हुआ था.

इतिहासकार मानते हैं कि नानक ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. पर उनके लिखे 976 दोहे, बाणियां जिनमें हिंदी, फ़ारसी, अरबी लफ़्ज़ों का इस्तेमाल है इस बात को धता बताते हैं. इनमें कही बातों में वेद, पुराण, कुरान, योग-शास्त्र, पतंजलि सबका सार है. 13 की उम्र में उन्होंने एक कविता लिखी थी जिसे उन्होंने ‘पट्टीलिखी’ नाम दिया था. इसमें वे खुद को ‘शायर’ कहकर संबोधित करते हैं.

डॉक्टर गोपाल सिंह अपनी क़िताब, ‘सिखों का इतिहास’, में एक दिलचस्प किस्सा बयान करते हैं. ‘जब नानक 13 के हुए तो पिता द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार में जनेऊ पहनने से इंकार कर दिया. नानक ने कहा मुझे वो धागा पहनना है जो न ख़राब हो, न जले, न मिटटी में मिले. इंसान अपने कर्मों से जाना जाए न कि किसी धागे से.’ कबीर ने भी कुछ ऐसा ही कहा है; ‘जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान…’

जवानी में शादी और दो बच्चे हुए. कुछ साल सुल्तानपुर में नवाब दौलत खान के यहां चाकरी की और बस, फिर निकल पड़े ख़ुद को खोजने, ईश्वर को पाने. साथ में कुछ लोग भी हो लिए जिनमें ‘मर्दाना’ नाम का मुसलमान भी शामिल था. इसके बाद जो हुआ उसने नानक को ही नहीं बल्कि दुनिया में धर्म की परिभाषा भी बदल दी. क्योंकि उन्होंने वह बात कह दी थी जिसको सुनकर समाज में हलचल पैदा हो गयी थी – ‘न कोई हिंदू, न कोई मुसलमान.

‘दुई जगदीश कहां ते आये कह कोने भरमाया
अल्लाह, राम, रहीम, केशव, हरी, हजरत नाम धराया

वही महादेव, वही मोहम्मद, ब्रम्हा, आदम कहिये

कोई हिंदू, कोई तुर्क कहावे एक ज़मी पर रहिये

वेद किताब पढ़े वे खुतबा वे मौलाना वे पांडे

विगत-विगत ते नाम धराया एक मिटटी ते हांडे.’

ये भक्ति काल का दौर था जब हिंदू और मुसलमान दोनों मज़हबों से लोग उकताने लग गये थे. औरतों की हालत बदतर थी. ऐसे में नानक ने कुरीतियों पर प्रहार किये और उन्हें ख़त्म करने की कोशिश की. इसके लिए उन्होंने दोनों धर्मों के बीच से होते हुए ‘सिख’ धर्म की स्थापना की.

हम अक्सर यह मानने की गलती कर जाते हैं कि नानक पर भक्ति काल का असर था. नानक ने अपने आप को उस दौर के संत जैसे रामानंद, वल्लभाचार्य, रामानुज के भक्ति भाव से दूर रखा. नानक ने एकेश्वरवाद का सिद्धांत दिया. उन्होंने ईश्वर को निरंकार माना, उसे एक रौशनी माना. उन्होंने कहा ईश्वर एक गूंज है. अनहद-नाद के समान पूरे ब्रह्मांड में फैला है. जपजी साहिब की पहली पौड़ी इसी से शुरू होती है.

‘इक ओमकार सतनाम करता पुरखु निरभऊ निरवैरु…’

दूसरा, उन्होंने भक्ति काल के गुरुओं के समान इस दुनिया को ‘माया’ नहीं समझा. उन्होंने यह तो माना कि यह क्षणिक है, पर यह भी कि यह हक़ीक़त है और इसके वे सारे द्वंद भी, जिनसे होकर इंसान अपने जीवन में गुज़रता है.

नानक ने अपने पूरे जीवन काल में घूम-घूमकर ज्ञान दिया और लोगों को अपना शिष्य बनाया. उन्होंने अपने जीवन में कुल पांच बड़ी यात्राएं की. पहली यात्रा सुल्तानपुर से पानीपत होते हुए दिल्ली, बनारस, कामरूप, फिर तलवंडी आये. उस यात्रा में उन्होंने 12 साल लगाये. इस यात्रा में जब वे सैय्यदपुर(एमीनाबाद, आज का पाकिस्तान) पंहुचे तो बाबर द्वारा बंदी बना लिए गए. दूसरी यात्रा में वे दक्षिण भारत से होते हुए श्रीलंका गए. तीसरी यात्रा कश्मीर, सुमेरु पर्वत की थी. चौथी, मक्का और आख़िरी पेशावर जहां उन्होंने अपने शिष्य ‘लहना’ को ‘अंगद’ का नाम देकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया.

इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्होंने लोगों की धारणाओं, अंध-मान्यताओं पर सवाल उठाये. बनारस में उन्होंने पंडितों को नदी में खड़े होकर पूर्व की दिशा की ओर जल अर्पित करते देखा. पूछने पर मालूम हुआ कि वे लोग अपने पूर्वजों का पिंड दान कर रहे थे. नानक ये देखकर पश्चिम की तरफ़ जल अर्पित करने लग गए. जब पंडितों ने उनसे पुछा, तो कहा – ‘वो क्या है कि मेरे खेत पश्चिम दिशा की तरफ हैं, मैं उन्हें पानी दे रहा हूं’. कुछ इसी तरह उन्होंने मक्का की तरफ पैर रखकर सोते हुए टोके जाने पर कहा – ‘मेरे पैर उस तरफ़ कर दो जहां मक्का न हो.’ महिलाओं की बदहाली पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा और कहा भी.

‘सो क्यूं मंदा आखिये, जित जम्मे राजान.’

बाकी धर्मों में माहवारी के दौरान औरतों को अपवित्र मानने की परंपरा भी उन्हें नागवार गुज़री. जनमसाखी में नानक की ये बातें विस्तार से कही गयी हैं.

ये बड़े कमाल की बात है कि सारे सिख गुरु उच्चस्तर के कवि हुए हैं. शायद यह गुरु नानक की वजह से ही था जिन्होंने अपनी शिक्षाओं को बड़ी सुंदर कविताओं की शक्ल में लोगों को समझाया था.

‘जगत में झूठी देखी प्रीत।

अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत॥

मेरो मेरो सभी कहत हैं, हित सों बाध्यौ चीत।

अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत॥

मन मूरख अजहूं नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत।

नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत॥‘

नानक ने अपने दर्शन में कहा है – ‘धर्म अनुभूति है न कि कुछ बनी बनायी मान्यताएं और कर्मकांड.’ उन्होंने हिंदू धर्म के कर्म के सिद्धांत को स्वीकार किया पर मनुस्मृति, हठयोग, वेद आदि नकार दिए. उन्होंने कहा:

‘दादे, दोस न देऊ किसे, दोस करमन आपियान.

जो में किया सो मैं पाया, दोस न दीजे अवरजान.’

जहां भी नानक गए, उन्होंने अंध-मान्यताओं पर प्रहार किया. वह चाहे हिंदू धर्म की हो या इस्लाम की. जात, धर्म, रंग सबसे परे रहने की बात उन्होंने कही.

‘जो ब्रमांडे, सोई पिंडे, जो खोजे सो पावे.’

खुशवंत सिंह अपनी किताब, ’सिखों का इतिहास’ भाग एक में लिखते हैं – ‘नानक मानते थे चूंकि ख़ुदा निरंकार है, इसलिए इंसान उसकी शक्ति का अंदाज़ा नहीं लगा सकता.’ हालांकि नानक ने अक्सर हिंदू या मुस्लिम नामों से ख़ुदा को संबोधित किया, जैसे राम, हरी, गोविंद, मुरारी, रब या रहीम, पर हर बार उसे ‘सत-करतार’ या ‘सत-नाम’ भी कहा. वे ख़ुदा को दातार भी मानते हैं. नानक ने ईश्वर को परम सत्य मानकर बाकी के प्रवर्तकों के द्वारा ईश्वर को इस दुनिया का जनक मानने वाली बात से दूर रखा. क्योंकि अगर ईश्वर ‘पिता’ है तो फिर उसका पिता कौन? अगर उसने दुनिया बनाई है तो फिर उसे किसने बनाया है?’. खुशवंत आगे लिखते हैं कि इस बात में भी एक समस्या थी – अगर ईश्वर सत्य है तो फिर सत्य क्या है? नानक ने इस बात का फैसला गुरु पर छोड़ दिया था.

‘नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतरे पार,

जो शरधा कर सेव दे, गुर पार उतारन हार.’

डॉक्टर गोपाल सिंह लिखते हैं कि उनकी जिस बात ने समाज पर गहरा असर डाला वह इस प्रकार है – ‘नानक ने कहा है कि ये जो शरीर है, जो ख़ुदा का मंदिर है, इसे सारे झूठ, आडंबर, अहम् से अलग करके उसी ‘सत-नाम’ में समर्पित कर दो, सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि, पूरे समाज के उत्थान में इसे लगा दो.’ इसके लिए नानक ने सहज योग की बात की है कि जिस तरह धीमी आंच पर खाना अच्छा पकता है, उसी तरह इस शरीर और मन को धीरे-धीरे संयम में लाओ तो ईश्वर में रम जाओगे.

ब्रिटिश राइटर जोसफ डेवी कनिंघम ने अपनी मशहूर किताब, ‘हिस्ट्री ऑफ़ द सिख’ में लिखा है कि नानक ने अपने से पहले के धर्मों के गुरुओं के ज्ञान को समझते हुए और भक्ति के सिद्धांत से बचते हुए ईश्वर की कल्पना की है – ‘वो एक है, निरंकार है, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान है’ और जो सत्य है वही ही ईश्वर है.’

‘सतनाम वाहे गुरु!’ का ख्याल इसी से है.

नानक ने खुद अपने दर्शन को तीन सूत्रों में कहा है;’ किरत करो, जप करो, वंड छको.’ मतलब काम, पूजा और दान. नानक हिंदुओं और मुसलमान, दोनों में बराबर पढ़े गए. नानक को भी आज शाह की उपाधि मिली हुई है:

‘बाबा नानक साह फ़क़ीर,

हिंदुओं का गुरु मुसलमानों का पीर’.

नानक के शिष्यों ने जो जिंदगी अपनाई वह हिंदुओं और मुसलमानों के तौर-तरीकों से अलग थी. हालांकि, वे आये इन्हीं मजहबों से थे. चूंकि नानक ने सत्संग की बात कही थी तो उनके मानने वालों को लगा कि जो लोग नानक को मानते हैं वे ही अब साथ बैठें. इस वजह से इन लोगों का अपने धर्मों से संपर्क टूटने लगा था. यह गुरु नानक के जीवित रहते ही शुरू हो गया था.

उनके अनुयायियों ने सत्संग या ख़ुदा की पूजा के लिए अलग स्थान बनाने शुरू कर दिये. जो हिंदू नानक को मानते थे, वे न संस्कृत में श्लोक पढ़ते, न मूर्तिपूजा करते. और जो मुसलमान उनके अनुयायी बन गए उन्होंने अरबी में पश्चिम की तरफ़ मुंह करके कुरान पढना बंद कर दिया था. ये लोग नानक की वाणी या दोहे पंजाबी ज़बान में गाने लग गए.

अब न नमस्ते था, न ही सलाम वालेकुम. ये लोग एक-दूसरे को ‘सत-करतार’ कहकर संबोधित करते. लंगरों की स्थापना हुई जहां सब साथ बैठ कर खाना खाते. इस सबका असर ये हुआ कि ये लोग अपने धर्म से अलग होकर एक ऐसे रास्ते पर चल दिए जिसमें आडंबर, प्रपंच, और जात-पांत जैसी चीजें नहीं थीं. सिख धर्म अब स्थापित हो गया था. खुशवंत सिंह कहते हैं – ‘न हिंदू, न मुसलमान.’ वाली बात ने ‘पंजाबियत’ को जन्म दिया. ये सही है और उतना ही सही है जितनी यह बात कि नानक ने कभी ख़ुद को पहला और आख़िरी पैगंबर नहीं माना.