एक आदमी है जो कांच के टुकड़ों के बीच घायल पड़ा है। जॉन अब्राहम 500 रूपये के नोटों के बंडल के साथ आते हैं उन्हें नोट पकड़ाते हैं और कहते हैं – नोट बदले लेकिन नीयत नहीं। शुरूआत के लिए ये केवल जॉन अब्राहम और मनोज बाजपेयी की सत्यमेव जयते की एक छोटी सी झलक है। मिलाप झावेरी की ये फिल्म आपको पुराने ज़माने में वापस लेकर जाएगी।

सत्यमेव जयते अगर गदर के ज़माने की फिल्म होती तो सॉलिड कमाई करती क्योंकि ये बिल्कुल उसी ढंग की मसाला इंटरटेनर है। जहां दर्शक हीरो के डायलॉग सुनकर सीटी मारते थे और मारते जाते थे। भ्रष्टाटार और कुर्सी आज के ज़माने की दो बड़ी समस्याएं हैं जिन्हें लेकर मिलाप ने बिल्कुल कॉमर्शियल इंटरटेनर बनाने की कोशिश की है।

अगर फिल्म के प्लॉट की बात करें तो जॉन अब्राहम का किरदार वीर एक सीरियल किलर बन चुका है और उन सारे लोगों को मौत के घाट उतार रहा है जो कि वर्दी पहनकर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी करते हैं। तो हमारा ये हीरो इन लोगों को चुन चुन के मारता है। और कैसे मारता है? सीधा जला देता है। और इस गुस्से का कारण है उसका अतीत। और बदला लेने की एक प्रतिज्ञा।

अब आते हैं इंस्पेक्टर शिवांश यानि कि मनोज बाजपेयी जो कि एक बड़ी मछली पकड़ना चाहते हैं इसलिए इस सीरियल किलर को पकड़ने का प्रण लेते हैं। वहीं दूसरी तरफ जब वीर देश से भ्रष्ट लोगों को जला नहीं रहा होता है तो वो कूड़ेदान से कुत्ते के पिल्ले उठाकर उनकी ज़िंदगी बचाने उन्हें एक जानवरों की डॉक्टर शिखा (आएशा शर्मा) के पास लेकर जाता है। ज़ाहिर सी बात है प्यार प्यार प्यार। बाकी का पूरा प्लॉट वीर और शिवांश की लुका छिपी का खेल है।

नोरा फतेही का दिलबर, फिल्म का शानदार पॉइंट है लेकिन बाकी गानों में कोई मज़ा नहीं है। सत्यमेव जयते, नई बोतल में डाली हुई पुरानी शराब है जहां केवल डायलॉगबाज़ी पूरी फिल्म को बचा ले जाती है। इस फिल्म को देखिए लेकिन केवल पुराना ज़माना याद करने के लिए।