35 वर्ष सांसद और 3 सरकारों में मंत्री रहने के बाबजूद अगर किसी नेता का राजधानी दिल्ली में एक अदद घर नहीं हो तो वो नेता कुछ ख़ास खूबियों वाला तो होगा ही। जी हाँ हम बात कर रहे हैं बीसवीं सदी के आखिर के सालों में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुंचने वाले नेता सीताराम केसरी की।

ये वो दौर था जब कांग्रेस पार्टी बुरे दौर से गुजर रही थी। आडवाणी के रथ पर सवार होकर धीरे धीरे भारतीय जनता पार्टी केंद्र के पटल पर आने की कोशिश में थी। इसी दौरान अध्यक्ष पद पर आसीन हुए सीताराम केसरी के बारे में कहा जाता है की प्रधानमंत्री के मोह में उन्होंने दो बार केंद्र की सरकार गिरा दी।

जो भी सक्रिय राजनीति में होता है उसका लक्ष्य कही ना कही प्रधानमंत्री की कुर्सी होती है। हाल ही में राहुल गांधी ने भी अपने प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं की बात की थी, अतः सब की ख्वाहिश होती है ये। अगर यही ख्वाहिश सीताराम केसरी की थी तो इस ख्वाहिश के होने में कोई गलत बात नहीं थी।
अब यहाँ बात ये उठती है की क्या केसरी ने अपनी महत्वाकांक्षा में सब कुछ ताक पर रखकर केंद्र की दो सरकारे गिरा दी थीं या फिर सरकार के गिराने के पीछे कोई ठोस वज़ह थी? बता दें की उस दौरान देवेगौडा और गुजराल सरकारें गिराई गई थी। देवेगौडा की सरकार गिराने का कारण यह बताया गया था की देवगौड़ा सांप्रदायिक शक्तियों को रोकने में विफल रहे थे। वही गुजराल सरकार के समय राजीव गाँधी हत्याकांड की जांच रिपोर्ट लीक हो जाने और उस रिपोर्ट में राजीव गाँधी की हत्या से सम्बंधित लोगों के सरकार में मंत्री रहने की वज़ह से कांग्रेस ने समर्थन वापिस ली थी और सरकार गिर गया था।

दोनों सरकारों के गिरने की खानापूर्ति भर के लिए ही कुछ वजहें बताई गई थी पर इन सब के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के 140 सीटों पर सिमट जाने का ठीकरा केसरी पर फोड़ दिया गया, हालांकि इन चुनाव प्रचारों में सोनिया गाँधी ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था।

साल 1998 में हुए इस मध्याविधि चुनाव में हार का ठीकरा सिर्फ केसरी पर फोड़ कर उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और सोनिया गाँधी को नया अध्यक्ष बना दिया गया। इस दौरान घटे घटनाक्रम की चर्चा प्रणव मुखर्जी ने अपनी किताब में भी की थी। उन्होंने किताव में लिखा था कि 5 मार्च 1998 के दिन सीताराम केसरी ने कांग्रेस कार्य समिति की मीटिंग बुलाई थी और इस मीटिंग में जितेंद्र प्रसाद, शरद पवार और गुलाम नबी आज़ाद ने सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पहल का आग्रह किया। परन्तु इस आग्रह को केसरी ने ठुकरा दिया और अपने खिलाफ षड्यंत्र रचने के आरोप लगा कर मीटिंग छोड़ कर बाहर चले गए।

इस मीटिंग को छोड़कर जब केसरी बाहर निकलें तो तत्कालीन मिडिया रिपोर्टों के अनुसार उनकी आँखों में आसू थे और ऐसा भी कहा गया की मीटिंग के दौरान उनके साथ बदसलूकी भी की गई थी। उस दौरान पत्रकार रहे राशिद किदवई ने इस घटना का जिक्र अपनी किताब ‘ए शार्ट स्टोरी ऑफ द पीपल बिहाइंड द फॉल एंड राइज ऑफ द कांग्रेस’ में किया था। उन्होंने इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा था कि दिल्ली के 24, अकबर रोड स्थित मुख्यालय से सीताराम केसरी को बेइज्जत कर निकाला गया था, उन्हें कांग्रेस से निकालने की मुहिम में सोनिया गांधी को प्रणव मुखर्जी, ए के एंटनी, शरद पवार और जितेंद्र प्रसाद का पूरा सहयोग मिला।

बहरहाल इस मीटिंग से बाहर निकलने के बाद उनकी राजनीति का अंत हो गया और उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। जब उनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हुआ तो उन्होंने पुनः सांसद बनने से मना कर दिया और अपना दिल्ली स्थित सरकारी बँगला छोड़ कर अपने गृह नगर बिहार के दानापुर चले गए। जब बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर एक बंगला देना चाहा तो उसे भी उन्होंने लेने से मना कर दिया। 24 अक्टूबर 2000 ई को एम्स में इलाज करवाने के दौरान जब सीताराम केसरी की मृत्यु हो गई तब अपने जीवन का 60 वर्ष कांग्रेस पार्टी को देने वाले इस नेता के लिए किसी के पास समय नहीं था।
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के एक चुनावी सभा में केसरी का नाम कांग्रेस के परिवारवाद को उजागर करने के लिए लिया तब एक बार फिर केसरी चर्चा में आ गए। ये बातें भी तब शुरू हुई जब शशि थरूर ने नेहरू के जन्मदिवस पर कहा की ये नेहरू ही थे जिनकी वज़ह से आज एक चायवाला देश का प्रधानमंत्री बन गया है। थरूर के इस बयान के जवाब में मोदी ने कहा की आप मुझ पर टिप्पणी करने के बजाय नेहरू जी की पार्टी कांग्रेस के अन्दर के लोकतंत्र को देखें जहाँ सिर्फ एक परिवार का हमेशा बोलवाला रहता है।