जब से न्यूज़ चैनल 24 घंटे चलने लगे हैं, खबर-एंकरों पर बड़ा दबाव बढ़ गया है. एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल की एक एंकर ने हिंदुस्तान और नरेंद्र मोदी को धमकाने का अपनी तरफ से ईमानदार और साहित्यिक प्रयास किया, लेकिन किसी दैवीय प्रेरणा से वह हास्यास्पद बन पड़ा है.

उनका मकसद होगा कि भारतीयों का खून खौल जाए, लेकिन इस वीडियो में सिर्फ हास्य रस का आनंद लिया जा सकता है. स्क्रिप्ट लिखने वाले प्रोड्यूसर को सलाम है.

इस वीडियो में महिला एंकर नाटकीय गुस्से में जिस सौंदर्य के साथ हाथ का पेन मेज पर पटकती हैं, वह समूचा दृश्य दिलकश है.  पूरी स्क्रिप्ट आपके लिए. सुनने से पहले पढ़ लें:

“मोदी साहब आपको लाख बार समझाया है, लेकिन कब समझ में आया है.

आग से न खेलो जल जाओगे, बारूद से न खेलो नेस्तोनाबूद हो जाओगे.

हर बार आते हो, बुरी नीयत लाते हो,

हर बार पीठ दिखाते हो दुम दबाकर भागते हो, (अरे रे! काफिया गलत हो गया)

हर बार मार खाते हो और पहले से बुरी तरह खाते हो.”

हवाई जहाज़, हेलीकॉप्टर, आबदोज़े, तुम्हारे ड्रोन गलती से सरहद पार कर लेते हैं हम माफ कर देते हैं. (कवि इन पंक्तियों में हास्य रस पैदा करना चाहता है.)

लेकिन उस वक्त से डरो, याद रखो किसी दिन सरहद उबूर (इसका ऊबर से कोई ताल्लुक नहीं) की गलती हमने कर ली तो न मान होगा, न हनुमान और न ही शक्तिमान. हर लंका ढहा दी जाएगी.

(कुल मिलाकर क्यूटत्व को प्राप्त प्रयास है बस ये समझ नहीं आया कि शक्तिमान और हनुमान के साथ भगवंत मान का रिफरेंस क्यों दिया गया)

मोदी साहब आप भी फिल्में देख-देख कर पूरे फिल्मी हो गए हो (उनके यहां केजरीवाल को शायद मोदी कहते हैं).कितनी बार समझाया है ज़रा सामने से आओ. कुछ हमारी सुनो कुछ अपनी सुनाओ. ये क्या छिप-छिप कर आने की कोशिश करते हो और हमें देख कर मुंह मोड़कर, नज़रे चुराकर,(यहां तक नो कमेंट मित्रों) मैदान छोडकर भाग जाते हो.

कश्मीर में बच्चों के साथ बेदर्दी से उनकी आंखों की रौशनी छीनकर, ताकत से जज़्बा-ए-हुर्रियत को दबा कर सोच कर (हुर्रियत का हुर्र! हुर्र से कोई संबध नहीं इसे एकता की भावना कहते हैं) कंट्रोल लाइन पर ज़िंदगी दहशत, वहशत, सक़्फाकियत और बर्बरियत का खेल खेल कर (मियां, मतलब छोड़ो लय देखो). 

न जाने मोदी सरकार अपने आप को क्या समझने लगी है. हमारी रफ्तार आपकी सोच से भी तेज़ है. हमारे इरादे आपके तवक्कों से भी ज़्यादा मज़बूत है. और हमारे अज़ाइम आपकी नीयत से भी ज़्यादा बुलंद हैं. ज़मीन हो आसमान हो या समंदर की गहराइयां हर जगह आग और खाक आपका इस्तकबाल करेगी. (यह भाषण का उपसंहार था.)

लेकिन हम नहीं चाहते कि कल तारीख का तालिब-ए-इल्म किताबे पढ़े, एक था भारत, एक था नरेंदर मोदी. इसीलिए इस वक्त हमारा, हम पाकिस्तानियों का सबसे बड़ा मसला ये है कि मोदी सरकार को किस ज़बान में समझाया जाए. क्या भारत को उसी की ज़बान में समझाया जाए. उसको ये बताया जाए कि हमें ये ज़बान भी आती है. या फिर अभी मोअज़्जिज़ सिफागतकारी भारत को, मोदी सरकार को अमन से रहने का तरीका और जंग का नुक्सान समझाया जाए. (बेस्ट जोक अंत में ही सुनाया जाता है).


सोचिए कितना अच्छा हो अगर ऐसी जवाबी काव्यात्मक पत्रकारिता की एक महफिल जमे. दोनों ओर से नाना प्रकार के एंकर अपने-अपने क्रोमा लेकर ही आधे मसले निपटा दें. हमारे नेता भी खुलकर दुनिया घूम पाएंगे और उनके नेता भी जान पाएंगे कि दुनिया में कश्मीर के अलावा भी वादियां हैं देखने के लिए. और जनता उसे तो तमाशा चाहिए वो मिलता रहेगा.